एक देश एक चुनाव लागू करने में सविधान में क्या बदलाव किए जा सकते है ? क्या पहले भी इस पर बहस हुई ?
साल नवंबर 2022 में मुख्य chief election commissioner राजीव कुमार ने कहा था कि चुनाव आयोग एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनावों को करा सकता है। राजीव कुमार के अनुसार, इसमें निश्चित रूप से बहुत सारे तामझाम बहुत सारे व्यवधान शामिल हैं, लेकिन ये सब विधायिकाओं को ही तय करना होगा |
इस बीच केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है। केंद्रीय संसदीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने गुरुवार को एक्स पर पोस्ट में ये जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संसद के इस spetial सेशन में पांच meetings होंगी। इस बीच अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार इस विशेष सत्र में एक देश एक चुनाव पर विधेयक ला सकती है।
आखिर क्या माजरा है One nation One Election पर बहस का
इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक देश एक चुनाव के बारे में जिक्र किया था उन्होंने कहा था कि देश के एकीकरण की प्रक्रिया ( process of unite) हमेशा चलती रहनी चाहिए। इसके बाद पीएम मोदी ने पीठासीन अधिकारियों के 80वें अखिल भारतीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए भी इस पर विचार रखा था। आखिर क्या है एक देश एक चुनाव का प्रस्ताव? पहले कब उठा था यह मुद्दा ? चुनाव क्या पहले कभी हुए थे एक साथ? इस पर चुनाव आयोग की क्या प्रतिक्रिया है ?आइये जान लेते है |
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 के स्वतंत्रता दिवस पर एक देश एक चुनाव का जिक्र किया था। तब से अब तक कई मौकों पर BJP की ओर एक देश एक चुनाव की बात की जाती रही है।
लोकसभा और विधानसभा Election कराने में खर्च लगभग बराबर ही होता है |
- 2014 लोकसभा चुनावों में 35 अरब 86 करोड़ 27 लाख रुपए खर्च हुए
- 2014 के बाद हुए हरियाणा विधानसभा चुनावों पर 33 करोड़ 72 लाख खर्च हुए।
- लोकसभा चुनावों का खर्च 29 करोड़ ही रहा।
- झारखंड विधानसभा चुनावों में 86 करोड़ खर्च हुए
- मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों में 1 अरब 31 करोड़ और लोकसभा में 1 अरब 99 करोड़ का खर्च हुए
- दिल्ली में विधानसभा चुनावों में 98 करोड़ 76 लाख रुपए खर्च हुए
- लोकसभा में 34 करोड़ 50 लाख का खर्च आया
बार-बार चुनावों होंगे तो खर्चा भी बढ़ेगा
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि 2019 में एक साथ चुनाव करवाने की बात कही थी हैं, तो पोलिंग बूथों को बढ़ाकर 10 लाख किए जाएँगे और इसी के साथ 13 लाख बैलेट यूनिट्स, 9.4 लाख कंट्रोल यूनिट्स और क़रीबन 12.3 लाख वीवीपैट मशीनों की जरूरत होगी। एक इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की कीमत 33 हजार 200 रुपए पड़ती है। चुनाव आयोग का कहना था कि साथ चुनाव होते हैं तो अकेले ईवीएम पर ही 4 हजार 555 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
जबकि एक ईवीएम 15 साल ही चलती है। तब आयोग ने कहा था कि पहले के समय के हिसाब से evm की कीमत बढ़ी है। 2024 में दोबारा एक साथ चुनाव कराने पर 1751 करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जबकि 2019 में यह बढ़ कर 2018 करोड़ रुपए हो जाएगा। वहीं 2034 में साथ चुनाव कराने पर नई ईवीएम खरीदने में 14 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे।
चुनाव आयोग ने हर उम्मीदवार के चुनावी खर्च की सीमा निर्धारित की है। लोकसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार 1 करोड़ रुपये तक खर्च कर सकता है. जबकि, विधानसभा चुनाव में यह सीमा 28 लाख से लेकर 40 लाख रुपये तक है. अरुणाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्यों में लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार 75 लाख और विधानसभा चुनाव में 28 लाख रुपये तक खर्च कर सकता है
जानकारी के अनुसार 2024 का आम चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव हुआ था अनुमान है कि इस बार इतना पैसा खर्च हुआ है, जितना 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भी नहीं हुआ था।
यदि देखा जाए तो एक वोट की क़ीमत 1400 Rs हो गई है।
इस मामले में सरकार का क्या कहना है ?
सरकार का कहना हो सकता है कि एक देश में नियमित अंतराल पर चुनाव कराना लोकतंत्र की महत्वपूर्ण पहल है। चुनाव माध्यम से जनता को सशक्त, स्वतंत्र और स्वाधीनता की भावना मिलती है और वह अपने प्रतिनिधियों को चुन सकती है जो उनकी समस्याओं और दिलचस्पी को समझते हैं।
चुनाव के माध्यम से जनता अपने राष्ट्र के नेता का चयन करके एक सरकार का गठन करती है जो उनकी आवाज़ को न्यायपूर्वक सुनती है और उनकी सेवा करती है।
चुनाव नेताओं के लिए भी एक मौका प्रदान करता है अपनी योग्यता, कार्यक्षेत्र और विचारों को दिखाने का। इसलिए, सरकार द्वारा एक देश में नियमित अंतराल पर चुनाव करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।



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