चंद्रयान-3 क्या है?
| चंद्रयान-3 | विश्लेषण |
|---|---|
| चंद्रयान-3 चाँद की सतह पर कब स्थापित हुआ | 23 अगस्त 2023 की सफल लेंडिंग हुई |
| भारत के अलावा कौन से देश चाँद पर गये | अमेरिका, रूस और चीन |
| चंद्रयान- 3 की बनाने में कितनी लागत आइ | 615 करोड़ केवल |
| चंद्रयान- 3 ने अभी तक क्या क्या सर्च किया | प्रज्ञान रोवर ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ऑक्सीजन और सल्फर की खोज की है। इसके अलावा प्रज्ञान ने चांद पर एल्युमिनियम, कैल्शियम, लोहा, क्रोमियम, टाइटेनियम, मैंगनीज, सिलिकॉन का भी पता लगाया है |
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा भेजा गया है, जो चाँद पर खोजबीन करने के लिए तीसरा भारतीय चंद्र मिशन है। इसमें चंद्रयान-2 के समान एक लैंडर और एक रोवर है|
- चंद्रयान-3 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा भेजा गया है।
- इसमें चंद्रयान-2 के समान एक लैंडर और एक रोवर है।
- चंद्रयान-3 में कक्षित्र नहीं है|
- यह मिशन सतीश धवन अंतराळ केंद्र से प्रक्षेपित होगा
- विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर की मिशन अवधि 14 दिन से कम होगी।
चंद्रयान-3 ने चांद पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है, इसके बाद अब लैंडर और रोवर क्या करेंगे?
इसरो के मिशन के बारे में हर जानकारी प्राप्त करें।
चंद्रयान-3 परियोजना विवरण: चंद्रयान-3 ने भारत को चांद की सतह पर पहुंचाया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी (ISRO) के वैज्ञानिकों ने 23 अगस्त 2023 की शाम को इसके सफल लैंडिंग पर बहुत खुशी मनाई है। चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है। 14 जुलाई को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से चंद्रयान-3 का लॉन्च किया गया था।
ISRO का पिछला मून मिशन 'चंद्रयान-2' अंतिम चरण में असफल रहा था। चंद्रयान-3 को पिछली गलतियों से सीखते हुए डिजाइन किया गया है। चांद पर सफल लैंडिंग के साथ ही भारत विश्व में चौथा देश बन गया है। अभी तक केवल अमेरिका, रूस और चीन ही चांद पर जाने का कारनामा किया था। ISRO ने चंद्रयान-3 को कई तरह के टेस्ट से गुजारा किया है। चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट से जुड़ी हर बात को 5 पॉइंट्स में समझते हैं|
चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट क्या है? चंद्रयान-2 मिशन से ये कितना अलग है?
'चंद्रयान' भारत का महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजना है। इसके माध्यम से भारतीय वैज्ञानिकों को चांद से संबंधित अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करनी है। 2003 के स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चांद से जुड़े मिशन की घोषणा की थी। ISRO ने 2008 में चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण किया। यह भारत की पहली गहरे अंतरिक्ष मिशन थी। 2019 में चंद्रयान-2 को प्रक्षेपित किया गया। 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा से चंद्रयान-3 का उड़ान भरेगा।
- चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 में थे अलग-अलग भाग, जैसे ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर।
- चंद्रयान-3 में प्रपल्शन मॉड्यूल, लैंडर और रोवर होंगे।
- चंद्रयान-3 का लैंडर+रोवर चंद्रयान-2 के लैंडर+रोवर से 250 किलो ज्यादा वजनी है।
- चंद्रयान-2 की मिशन लाइफ 7 साल (अनुमानित) थी, वहीं चंद्रयान-3 के प्रपल्शन मॉड्यूल को 3 से 6 महीने काम करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- चंद्रयान-3 चंद्रयान-2 की तुलना में ज्यादा तेजी से चांद की तरफ बढ़ेगा।
- चंद्रयान-3 करीब 40 दिन की सफल उड़ान भरेगा।
चंद्रयान-3 की लॉन्च तिथि, लैंडर और रोवर के नाम क्या है?
- चंद्रयान-3 का लॉन्च 14 जुलाई 2023 को हुआ।
- लॉन्च का समय दोपहर 14:35:17 बजे था।
- चंद्रयान के रोवर और लैंडर के नाम में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
- चंद्रयान-3 के लैंडर का नाम 'विक्रम' और रोवर का नाम 'प्रज्ञान' ही बना रहेगा।
चंद्रयान 3 मिशन का मुख्य लक्ष्य क्या है?
चंद्रयान-3 का मिशन चंद्रयान 2 की तरह ही है जिसकी लागत 615 करोड़ रुपये है। इस मिशन के द्वारा हम चांद की सतह के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने का प्रयास करेंगे। चंद्रयान-3 के लैंडर पर चार तरह के साइंटिफिक पेलोड भेजे जाएंगे। इन पेलोड के माध्यम से हम चांद पर आने वाले भूकंपों, सतह की थर्मल प्रॉपर्टीज, सतह के करीब प्लाज्मा में बदलाव और चांद और धरती के बीच की सटीक दूरी का मापन करने का प्रयास करेंगे। इसके अलावा, हम चांद की सतह की रासायनिक और खनिज संरचना की भी अध्ययन करेंगे।
ISRO के चंद्रयान-3 मिशन की चुनौतियां क्या हैं?
यह एक बड़ी चुनौती थी कि अनजान सतह पर लैंड करें। कंप्यूटर ने अपने सेंसर्स के आधार पर लोकेशन, हाइट, वेलोसिटी आदि का अंदाजा लगाकर फैसला किया।
चंद्रयान 3 मिशन भारत के लिए कितना जरूरी है?
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चंद्रयान-3 मिशन से विज्ञान के दृष्टिकोण से कई महत्वपूर्ण सवालों के उत्तर मिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम जान सकते हैं कि चांद की सतह पर भूकंप वाली लहरें कैसे उत्पन्न होती हैं और चांद की सतह थर्मल इंसुलेटर की तरह क्यों व्यवहार करती है। हम इस मिशन के माध्यम से चांद के रासायनिक और तत्विक संरचना के बारे में भी जान सकते हैं। इसके अलावा, हम चांद के प्लाज्मा में क्या-क्या होता है इसके बारे में भी जान सकते हैं। चंद्रयान-3 मिशन की सफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक होगी। इससे भारत वह चौथा ऐसा देश बन जाएगा जिसने चांद पर सॉफ्ट-लैंडिंग की होगी। हाल के सालों में इसरो ने खुद को दुनिया की लीडिंग स्पेस एजेंसी के रूप में स्थापित किया है चंद्रयान की सफलता से उसकी वैल्यू और मजबूत होगी।
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दक्षिणी ध्रुव के समीप चंद्रमा की लैंडिंग का महत्त्व:
चंद्रमा के लिए अंतरिक्ष यान मिशनों ने ऐतिहासिक रूप से मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय क्षेत्र को लक्षित किया है, क्योंकि यह क्षेत्र चंद्रमा के अनुकूल भूखंड और परिचालन स्थितियों के कारण अधिक महत्त्वपूर्ण है।
- हालांकि, चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव भूमध्यरेखीय क्षेत्र की तुलना में काफी अलग और अधिक चुनौतीपूर्ण है।
- कुछ ध्रुवीय क्षेत्रों में सूर्य का प्रकाश बहुत ही कम होता है, जिसके कारण उन क्षेत्रों में हमेशा अंधेरा रहता है और वहाँ तापमान -230 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है।
- सूर्य के प्रकाश की कमी के साथ अत्यधिक ठंड उपकरणों के संचालन एवं स्थिरता के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।
- चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अत्यधिक विपरीत स्थितियाँ प्रदान करता है जो मनुष्यों के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करता है, लेकिन यह उन्हें प्रारंभिक सौरमंडल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी का संभावित भंडार बनाता है।आसा
- इस क्षेत्र का पता लगाना महत्वपूर्ण है, जो भविष्य में गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण को प्रभावित कर सकता है।
चंद्रयान ३ द्वारा की गई खोजें
चंद्रयान 3 का रोवर प्रज्ञान चांद के दक्षिणी ध्रुव पर निरंतर काम कर रहा है। रोवर प्रज्ञान ने एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। इसरो ने बताया है कि चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। प्रज्ञान रोवर ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ऑक्सीजन और सल्फर की खोज की है। इसके अलावा प्रज्ञान ने चांद पर एल्युमिनियम, कैल्शियम, लोहा, क्रोमियम, टाइटेनियम, मैंगनीज, सिलिकॉन का भी पता लगाया है।
चंद्रयान 3 का रोवर प्रज्ञान चांद के दक्षिणी ध्रुव पर निरंतर काम कर रहा है। इसके अलावा, रोवर प्रज्ञान को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। इसरो ने बताया है कि रोवर प्रज्ञान पर लगे पेलोड लिब्ज़ ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सल्फर की मौजूदगी की पुष्टि की है। इसके साथ ही, चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ऑक्सीजन के साथ-साथ एल्युमीनियम, कैल्शियम, आयरन, क्रोमियम और टाइटेनियम की मौजूदगी का भी पता लगाया गया है। हालांकि, हाइड्रोजन की खोज अभी जारी है।
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चंद्रन 3 का कैलेंडर क्या है?
विक्रम सारबाई को श्रधांजलि अर्पित करने के सवार पर चंद्रयान का नाम विक्रम रखा गया।
चन्द्रयान ३ के वैज्ञानिक कौन है?
श्री S मोहन कुमार ISRO के सबसे बड़े वैज्ञानिक है।
चंद्रयान ३ में श्रीकांत की भूमिका क्या थी ?
श्रीकांत ने दिल्ली के एक स्कूल कार्यक्रम में छात्रों को चंद्रयान-3 के वैज्ञानिक और मिशन निदेशक के रूप में कड़ी मेहनत, और ईमानदारी के महत्व पर जोर दिया। इसरो में चंद्र मिशन का नेतृत्व करने वाले श्रीकांत ने छात्रों को छोटी उम्र से ही अपने लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
चंद्रयान- 2 और चंद्रयान -3 में क्या अंतर है?
चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के बीच एक उपकरण का अंतर है। चंद्रयान-2 ने अपने ऑर्बिटर कक्षा में 9 उपकरण लगाये थे जबकि चंद्रयान-3 के पास एक अकेला उपकरण है जिसे द स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्री ऑफ प्लैनेट अर्थ कहा जाता है।
चाँद की सतह पर कितना तापमान पाया गया?
चंद्रयान ३ ने चंद्र की सतह पर 70 degree तापमान पाया । वैज्ञानिकों के अनुसार चाँद का तापमान 20 se 30* के आसपास होना चाहिये।
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अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों की सफलता और नेतृत्व ने भारत की क्या अनिवार्यता है?
चंद्रयान-3 द्वारा चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण भारत के अंतरिक्ष प्रयासों में एक नए युग का आरम्भ हुआ । चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास भारत की सफल सॉफ्ट लैंडिंग राष्ट्रीय गौरव का विषय है , जिसने देश को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के इतने निकट अंतरिक्ष यान उतारने की अतुलनीय उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले देश के रूप में स्थापित किया है। यह उपलब्धि भारत के लिए मानव जाति और ब्रह्मांड के बीच संबंधों को रूपांतरित करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का अवसर प्रस्तुत करती है।
चंद्रयान -3 भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
1. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में नेतृत्वकारी भूमिका:
इस कार्यक्रम के साथ भारत ने अपनी क्षमता प्रदर्शित की है जो चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की है, जिसमें रूस, अमेरिका और चीन जैसे देशों के विशेष समूह शामिल हैं।
भारत अपने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन और कक्षा को 'डि-क्लटर' करने के प्रयास कर रहा है, जो अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में इसके नेतृत्व को प्रदर्शित करता है।
इससे भारत को नई अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक विश्व के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
2. चंद्रमा के गुणों की जाँच:
चंद्रयान-3 ने अपने मॉड्यूल में सात विज्ञान पेलोड लेकर गया। प्रोपल्शन मॉड्यूल पृथ्वी के वायुमंडल के अध्ययन, लैंडर मॉड्यूल चंद्र सतह के गुणों की जाँच करने और रोवर मॉड्यूल चंद्र शैलों एवं मृदा के विश्लेषण में उपयोगी रहा।
जल हिम (water ice) की मौजूदगी की पुष्टि से चंद्रमा के पिघली अवस्था में होने के इतिहास की पुष्टि हुई और उपसतह में जल हिम का पता लगाना इसकी प्रमुख उपलब्धियों में से एक रही।
3. अंतरिक्ष पर्यटन और आर्थिक गतिविधियाँ:
निजी अंतरिक्ष उद्यानों (space parks) की बढ़ती रुचि अंतरिक्ष पर्यटन को बढ़ावा दे सकती है।
इन-ऑर्बिट विनिर्माण केंद्रों (in-orbit manufacturing hubs) का निर्माण करने से स्मार्ट स्पेस रोबोट आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।
भारत में 500 से अधिक स्पेस-टेक स्टार्टअप, MSMEs और उद्योग नये अंतरिक्ष आंदोलन (NewSpace movement) को ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
disclaimer: फ़्रेंड्ज़, ये artical हमने पत्र पत्रिकाओं , न्यूज़ पेपर, और अन्य लेखों के माध्यम से लिखा है। और साथ ही हमारा पूरा प्रयास रहता है की आपको उचित जानकारी दी जाए। लेकिन फिर भी इस आर्टिकल में कोई जानकारी ग़लत लिखी जाती है तो कृपया हम उसके ज़िम्मेदार नहीं है ।


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